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27/10/15

तू आ भी जा - ‪भरत तिवारी #‎फैज़ाबादी‬ : Poem by Bharat Tiwari #Faizabadi

1 टिप्पणी:

तू आ भी जा


(Richard Diebenkorn, Girl Looking at Landscape, 1957. Oil on canvas)

तू आ भी जा
कि मिट सकें
मायूसियाँ ज़हन से,
तू आ भी जा
भर ले मुझे
मख़मली आग़ोश में
के साँस लूँ मैं
डूब तेरे सीने में -
कटे ज़हर
घुला है जो
फ़िज़ाओं में
माहौल में,
तू आ भी जा
के इश्क़ ये
बचा रहे जहान में,
तू आ भी जा
दिखा ही दे
बेचैन ओ ग़मज़दाओं को
मुहब्बत की जलवागिरी
मुहब्बत का रास्ता।

‪#‎Faizabadi‬

tu aa bhi ja

tu aa bhi ja
ki mit sakeN
maayusiyaN zehan se,
tu aa bhi ja
bhar le mujhe
makhmali aagosh me
ke saaNs looN mai
doob tere siine me -
kate zehar
ghula hai jo
fizaoN me
maahoul me,
tu aa bhi ja
ke ishq ye
bacha rahe jahan me,
tu aa bhi ja
dikha hi de
bechain o ghamzadaoN ko
muhabbat ki jalwagiri
muhabbat ka raasta.

11/5/14

जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ

3 टिप्‍पणियां:

जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ 

mother's day

माँ को ज़हन में रख के कविता कैसे लिखूँ
उसी के जन्मे उसी के हिस्से
को उसके ही बारे में लिखने को

क्या बोलना पढ़ेगा
जो पल-पल माँ को याद किये जाता है
उसे समझ नहीं आता कि माँ नहीं भी हो सकती
माँ बस होती है........... इससे आगे और पीछे ज़हन को नहीं पता

इस रिश्ते की जादूगरी
देखिये
जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ
भूल जाती है
उम्र अपनी सुइयों को
मुस्कान अपने दुखों को
खुशियाँ अपने आप को
और ऐसा और ऐसा बहुत कुछ होने के लिए
माँ का ख्याल ही चाहिए होता है
माँ एक ख्याल ही तो है
एक
अजर
अमर
जिंदा खयाल


भरत तिवारी  ११.०५.२०१४
नई दिल्ली

26/2/14

नग्न

कोई टिप्पणी नहीं:
मेरे तेरे उसके 
उतरे हुए कपड़े 
पूरी तरह नग्न
चीरे गये कपड़े
उसके हाँथों मेरे
मेरे हाँथों तेरे
शहर का शहर नंगा
चीथड़ों से उठता धूंआ
धूएँ में तैरते
खेत
गाँव 
बैल
तैरते...
बस्ते
क़लम 
स्कूल का मैदान
राख हुए
सारे-सम्बन्ध 
आइने
मकान

जब सब नंगे हों
तो झूठ ?
झूठ सफ़ेद कपड़ा पहन 
कुछ नग्न ले गया साथ
सुना है -
अब वो भी वैसे ही कपड़े पहनते हैं

नग्न की परिभाषा,
अब बदल गई है

14/1/14

सुनो ! कब आओगी ?

कोई टिप्पणी नहीं:
                                   मैं इस किनारे बैठा था
                                   और वो 
                                   दूसरे किनारे से भी दूर 
                                   कही छुप के बैठी रही,
                                   खड़े हो कर मैंने जोर से आवाज़ लगाई
                                                       ... सुनो ! कब आओगी ?
                                   पानी में पत्थर की तरह आवाज़, 
                                   दो-तीन टिप्पे खा कर... गुडुप.

                                   कम से कम किनारे पर ही जाओ - 
                                   रात में टॉर्च को जला-बुझा कर बातें कर लेंगे.

                                   सुना है, रौशनी की गति आवाज़ से तेज होती है.
                                                                                  #BharatTiwari

29/12/13

इबादत — भरत तिवारी

कोई टिप्पणी नहीं:
इबादत — मैं जा रहा हूँ मंदिर बनाने — भरत तिवारी । #BabriMasjid #ShauryaDiwas

मैं जा रहा हूँ मंदिर बनाने।
अब बहुत व्यस्त रहूँगा।

देश को तोड़ कर पत्थर इकट्ठे करने हैं,
कुछ बच्चे चाहिए होंगे,
पत्थरों को तर्शवाना होगा।
सबसे ज्यादा ज़रूरत इसे मजबूत बनाने की है.
इतना मजबूत -
कि ...
कोई तोड़ ना सके।
बुर्ज पर चाँद की रौशनी ना पड़े ये भी देखना है।

मजबूती कैसे लायी जाये - हल मिल गया है।
खून के रिश्ते,
और उनके रिश्तों के रिश्ते,
सब को बुलाना है,
जोड़ का शक्तिशाली मसाला बनाने के लिए।

मसाला बनाना कोई मजाक नहीं है,
एक-छः का मजबूत मसाला !
एक हिस्सा बचे लोगों का खून
और छः हिस्सा हड्डीयां।

बहुत काम करना है - इबादत करना अब आसान नहीं रहा ...

#BharatTiwari

9/12/13

उम्मीद का कुआँ

कोई टिप्पणी नहीं:
उम्मीद का कुआँ 
-----------------
उम्मीद के कुँए की खुदाई हो रही है,
जिस ज़मीन का खून चूसा जा चुका है...
उसी के अन्दर कई जगह गड्ढे खुदे दिख रहे हैं
खोदाई करने वालों के अलग-अलग गुट, 
अलग-अलग सुरक्षा के उपाय उनके
प्लास्टिक, लोहे, कागज़, कपडे की टोपी पहने 
                                                  ये लोग
सब खुदाई में व्यस्त दिख रहे हैं
उधर दूर एक गुट है, बड़ा गुट है , सबसे बड़ा
वो खुदाई नहीं कर रहा -
क्योंकि उस ने ही ज़मीन बंजर बनाई है
लेकिन वो कह रहा है - हमें ही पता है... 
आपकी प्यास, आपकी भूख कैसे मिटायी जाती है

उम्मीद है कि प्यासे खड़े लोग उसकी बात नहीं बाकियों के गड्ढे
                                                  और उसकी गहराई देखेंगे

तेल-पानी की जगह उम्मीद निकलेगी, ये उम्मीद है


7/9/13

कविता : टेल-बोन

1 टिप्पणी:
टेल-बोन
======
चीख तो सब ने सुनी थी
समझी शायद ही किसी ने
चीख को शोर कह,
कानों पर हाथ रख लिए।
बोले नौटंकी है,
आंखें फेर बहुत दूर चले गए नजरों से 
दरवाज़े-खिड़कियां धड़-धड़ करके खुले
चूं चूं की आवाज़ के साथ धीरे से बंद होते गए,
मानो फुटबॉल मैच में मैक्सिकन-तरंग।
चूं चूं की आवाज़ दरवाजे से नहीं,
उसके पीछे एक-पर-दूसरे चेहरे की नहीं
डरपोकपन की होती है।
मनहूसियत और डरपोकपन  साथ-साथ रहते हैं – मरण-मरण का साथ ।

चीख की भाषा समझने के लिए
हटाने पढ़ते हैं,
कानों में लगे दर्द-को-पहुँचने-से-रोकने-वाले फिल्टर।
जिंदा करनी पड़ती है रीड़ की वो-नस
जो आँखों का देखा, देख
नहीं मुड़ने देती गर्दन दूसरी तरफ।
रीड़ की नसों को इतना ना मारा जाए
कि प्रकृति उन्हें टेल-बोन बना दे।
#BharatTiwari

18/6/13

सारे रंगों वाली लड़की - 2

2 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
दूरी से उपजती पीड़ा
अहाते में सूखता सा मनीप्लांट
जैसे मर ही जाएगा
फ़िर आयी
बिना-बताये-आने-वाली-दोपहर
उसकी बेल आम के पेड़ पर चिपकी है
पता नहीं क्यों नहीं मरा
नियति
और कैसे पेड़ के तने को छू गया
पत्तों का विस्तार
देखते-देखते हथेलियों से बड़ा हो गया
वेदना – जब लगा कि जायेगी
स्मृतियों को खबोड़
जड़ से लगी यादें बाहर आने लगी
दर्द पुराना साथी
सहारा देता है – फ़िर क्या धूप क्या अमावस
दूर गए प्रेम की खोज
मिल ही जाता है स्मृति का कोई तना
ब्रह्माण्ड की हथेली से बड़ा रुदन तब अनुभूति का
कैसे मरे ये वेदना

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

सारे रंगों वाली लड़की
वृक्षों में भी हो ना


भरत तिवारी १८.६.२०१३, नई दिल्ली 

11/6/13

सारे रंगों वाली लड़की

12 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
कहाँ हो

सूरज इस काली रात को
जिसने सब छिपा लिया
उसे धराशाई कर रहा है

आम के पेड़ में  अभी-अभी जागी कोयल
धानी से रंग का बौर
सब दिख रहे हैं
उन आँखों को
जो तुम्हे देखने के लिए ही बनीं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

तुम्हारी साँसों का चलना
मेरी साँसों का चलना है
और अब मेरी साँसें दूर हो रही हैं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

गए दिनों के प्रेमपत्र पढ़ता हूँ
जो बाद में आया – वो पहले
सूख रही बेल का दीवार से उघड़ना
सिरे से देखते हुए जड़ तक पहुँचा मैं
पहले प्रेमपत्र को थामे देख रहा हूँ – पढ़ रहा हूँ
देख रहा हूँ पहले प्रेमपत्र में दिखते प्यार को
और वहीँ दिख रहा है नीचे से झांकता सबसे बाद वाला पत्र
और दूर होता प्रेम

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

वहाँ हो
यहाँ हो


भरत तिवारी, ११.६.२०१३  नई दिल्ली 


22/4/13

नए साहब सुनो !

2 टिप्‍पणियां:

कैसा नया माहौल 
बना रहा हो ये 

...हाँ सुना है
जब साहब होते थे
तब 
साहब ही साहब होते थे...
देखा है पर्दे पर 
बेंत चटकाते
धप धप करते ऊँचे भारी जूतों को
किरर्र किरर्र करती मशीन
नोक को फैला 
दिखाती थी साहबों की चालें ...
मगर अब तो 
वो मशीन भी ना रही
तो क्या - 
वो स्वेत श्याम माहौल 
अब आँखों के सामने 
रंग कर दिखाओगे ...

नए साहब लोगों सुनो 
कुछ धहक रहा है
पहले धीमा था
मगर अब
लील खायेगा तुमको  



- भरत 

29/3/13

सब छूट जाता है

4 टिप्‍पणियां:

सब छूट जाता है
जिसका छूटता है उसे क्या पता
एक-एक पल बेच
कल खरीदता
खुशियाँ बेचता
खरीदने के लिए - ख़ुशी
फिर
सब छूट जाता है
बेचे हुए पल और खुशियाँ ही रास्ता देखते हैं
सब छूट जाता है Time Reveals Truth Giovanni Domenico Cerrini
ख़रीदी खुशियों के कितने खरीददार कितने उम्मीदवार
चक्र में पीछे
अनभिज्ञ
हाथ उठा दर्ज करते
अपनी लालसा
भीड़ उठाये हाथ लालसा के  
खरीदने को अनवरत हाथापाई करती
खरीदती ! घातु कागज़ पत्थर के सपने
बेचती आँचल महक मुस्कान,
दुलार बचपन जवानी,
गाँव गली प्यार
अपने सपने
तभी
सब छूट जाता है

कुछ ना बना सकने वाला
बनाने वाले की कृति पर अपना नाम लिख
अपनी मान लेता ,
खुश होता
अपनी बता
अपनी समझ
चक्र का हिस्सा है
चक्र घुमा
और
सब छूट जाता है

17/3/13

भूख खबर मवाद

2 टिप्‍पणियां:

हिंदी कविता समाज की गंदगी खबर
         खबर
         भूख की
         भूखों की
         भूख बेचने वालों की
         नंगों की
         नंगे होतों की
         नंगे करे जातों की
         जंगल की
         जंगलियों की
         जंगलराज की
         जंगल बचाने की
         ... डिमांड में है
         जंगलियों की भूख बढ़ रही है
         डिमांड की नियति – बदलते रहना


         खबर
         बेचने की
         बिकने की
         बिक गए की
         देश की
         विदेश की
         देशप्रेम की
         विदेश प्रेम की
         ... डिमांड में है
         प्रेम बिक रहा है
         प्रेम की नियति – बदल रही है

         अन्दर झाँकना बंद कर दिया
         बाहर देखना मना है
         मैल –
         चमड़ी का पोर पार कर गयी
         रंग खून का और रंगत मवाद की
         मवाद से चले खबरी-मसाला-मशीन
         खबरों के प्रेमी -
              सब ...

14/3/13

कहाँ हो मम्मी...!

3 टिप्‍पणियां:
कहाँ हो मम्मी...!
छत पर..
रसोई में ..
बाहर गार्डन में...
स्कूल से तो आगई होंगी.. !?!

बगीचे में गौरैया भी पूछ रही है..

रसोई के सारे मर्तबान चुप हैं..

मेरी चरखी की सद्दी पीली हो गयी अब तो,

स्कूल चल रहा है..

कहाँ हो मम्मी...?
where are you mother poetry bharat tiwari shajar कहाँ हो मम्मी कविता भरत तिवारी शजर
कैक्टस का फूल
- रात खिला था ,
गए सालों जैसा ,
कमल सा मुह बाये...
तुम्हे खोज रहा था...
सुबह सूख गया , अगले साल तक के लिए,

आधी गौरैया कहीं चली गयीं...

पतंग का रंग उड़ गया..............
हाथ लगाया तो कन्ना टूट गया..

मर्तबान से अचार की महक भी चली गयी........

स्कूल में नयी बिल्डिंग बनी देखी,
लड़कियां टीचर को मैडम बुलाती हैं,
'बहन जी ' नहीं.......!

कहाँ हो मम्मी..

सब बदल रहा है,

लेकिन चाँद नहीं बदला...
करवा चौथ भी नहीं..
बस गणेश जी नहीं आते गन्दा करने अब,

उनके साथ हो न आप....!?!
चाँद के पीछे..

देख रही होगी..
मैं भी नहीं बदला ......
"Mother and Child" by Seshadri Sreenivasan

- शजर

27/2/13

आठवां

4 टिप्‍पणियां:



परिंदा बन रहा हूँ
परों पर कोपलें
उग रही हैं

सुना है
तुमने
सात आकाश बनाये हैं
मुझे आठवां देखना है

और तुम जिस आकाश से देखते हो
उसमें तुम्हे
देख लेता हूँ
खिड़की का पर्दा हटा कर

7/1/13

फ़िर करी गंगा मैली

1 टिप्पणी:

गंगा ने हो निर्मल
अभी बहना शरू करा था
अभी निर्मल हुई भर थी
अस्थियों से दामिनी की
हो पवित्र 
मिलती नहीं वो राख सदियों
जो कर सके यों निर्मल 

अभी बहना शरू करा भर था
आये नहाने 
अपने किये करे की 
बोलती राख से सने 
बकरी सा मैं-मैं करते 
लेडियाँ हाथ में लिये
मैं मैं

इतना अहम 
इतनी अहम 
सह ना सकी
बह ना सकी 
साफ़ और रह ना सकी
दामिनी तो स्वच्छ थी
दामिनी तो स्वच्छ है
स्वच्छता की देवी वो
चल पड़ी आगे वहाँ को
न पहुँचे जहाँ वो - जो हर जगह पहुँचे 

वसुंधरा की सीध में आकाश गंगा थी
प्रलय से बचाने को जिसने लड़ा
ना देखें हम जो - 
दिखा कर हमें
खुश थी शिव की जटा की राख को पा कर

बकरियों के झुंड पहले
छुप के आये 
बाँए से आये
दाएँ से आये 

वो भी आये जो कभी ना आये 
बहती गंगा में खूब नहाये 
वर्षों वर्ष की मैल 
दाएँ-बाएं छुपाये

क्यों ना हो फ़िर गंगा मैली
फ़िर करी गंगा मैली

'शजर' ७.१.१३ - ०४:१८

31/12/12

तुमको पता होगा tumko pata hoga

3 टिप्‍पणियां:

सुनो तुमको पता होगा
बताओगे
जब हम पहले-पहले मिले थे
तब की जो तस्वीरें हैं
उन सब में
तुम अब भी उतने ही खूब दिखते हो
और मैं
बेवकूफ
दुबला
पतला
मरियल
बेरोजगार
अपने को उन तस्वीरों में देख
समझ नहीं पाता
आखिर तुमने तब ऐसा क्या देखा था मुझमे
जो ...

जो मुझे नहीं दिखता
हाँ ?


तुमको पता होगा
- शजर
tumko pata hoga
- shajar
suno tumko pata hoga
bataoge
jab ham pahle-pahle mile the
tab ki jo tasveereN haiN
un sab me
tum ab bhi utne hi khoob dikhte ho
aur mai
bevkoof
dubla
patla
mariyal
berojgaar
apne ko un tasveeroN me dekh
samajh nahi pata
aakhir tumne tab aisa kya dekha tha mujh me
jo …

jo mujhe nahi dikhta
haan ?



24/12/12

चली देवी

2 टिप्‍पणियां:

बर्बरता निर्लज्ज टूटी
प्रणय पावन रक्त रंजित
दहला यम
पाँव उठे , पाँव थमे
पाँव उठे , पाँव थमे
धरा करुण रुधन
मानव मौन
पाँव उठे
चलो देवी
पाँव उठे
चली देवी

14/12/12

कविता - सफ़ेद रौशनी की ठंडी लपट

कोई टिप्पणी नहीं:

दिमाग की नसें पिघल 
लावे का गर्म घोल बन जाती हैं
सारे ख्याल
पिछले-अगले
बुदबुदा कर
छोटे बुलबुले बन
फूटने से ज़रा सा पहले
सतरंगी हो जाते हैं
गोल बुलबले में
आखिरी बार उतरता है
माजी का मंज़र
और उबाल खाते घोल में खो जाता हैं

फिर वो बारीक़ अक्षुण हिस्सा फूलता है
जो प्रणय के पहले अहसास का है
बढ़ता ही चला जाता है
लावे की आग धीमी कर
उसे समेट देता है
फिर सब कुछ उसमें ही
एक-एक कर समता जाता है
आँखें पहली और आखिरी बार
बुलबुले के अंदर से
प्रणय का रंग देखने को खुलती हैं
और बंद हो जाती हैं

सफ़ेद रौशनी की ठंडी लपट आती है
ले जाती है


: शजर १४.१२.१२ नई दिल्ली 

16/11/12

गुलाबी पाँव gulaabi paaNv

1 टिप्पणी:
अच्छा हुआ था
कि,
तुम्हारे गुलाबी पाँव
कभी मेरे घर में आये थे
〃〃〃 तुम्हारे जाने के बाद
पीछे से वापस लौट
वो अपना रंग मुझे दे गये थे
〃〃〃 वो उतरा नहीं
ना मुझे छोड़ कर कहीं गया
- तुमसे जुड़ा सब वैसे का वैसा ही
है मेरे भीतर


तुम भी • • •

achha hua tha
ki,
tumhare gulaabi paaNv
kabhi mere ghar meN aaye the
〃〃〃 tumhare jaane ke baad
peeche se wapas laout
vo apna rang mujhe de gaye the
〃〃〃 wo  utra nahi
na mujhe chhod kar kahin gaya
- tumse judda sab waise ka waisa hi
hai mere bheetar

tum bhi • • •


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