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11/5/14

जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ

3 टिप्‍पणियां:

जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ 

mother's day

माँ को ज़हन में रख के कविता कैसे लिखूँ
उसी के जन्मे उसी के हिस्से
को उसके ही बारे में लिखने को

क्या बोलना पढ़ेगा
जो पल-पल माँ को याद किये जाता है
उसे समझ नहीं आता कि माँ नहीं भी हो सकती
माँ बस होती है........... इससे आगे और पीछे ज़हन को नहीं पता

इस रिश्ते की जादूगरी
देखिये
जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ
भूल जाती है
उम्र अपनी सुइयों को
मुस्कान अपने दुखों को
खुशियाँ अपने आप को
और ऐसा और ऐसा बहुत कुछ होने के लिए
माँ का ख्याल ही चाहिए होता है
माँ एक ख्याल ही तो है
एक
अजर
अमर
जिंदा खयाल


भरत तिवारी  ११.०५.२०१४
नई दिल्ली

7/9/13

कविता : टेल-बोन

1 टिप्पणी:
टेल-बोन
======
चीख तो सब ने सुनी थी
समझी शायद ही किसी ने
चीख को शोर कह,
कानों पर हाथ रख लिए।
बोले नौटंकी है,
आंखें फेर बहुत दूर चले गए नजरों से 
दरवाज़े-खिड़कियां धड़-धड़ करके खुले
चूं चूं की आवाज़ के साथ धीरे से बंद होते गए,
मानो फुटबॉल मैच में मैक्सिकन-तरंग।
चूं चूं की आवाज़ दरवाजे से नहीं,
उसके पीछे एक-पर-दूसरे चेहरे की नहीं
डरपोकपन की होती है।
मनहूसियत और डरपोकपन  साथ-साथ रहते हैं – मरण-मरण का साथ ।

चीख की भाषा समझने के लिए
हटाने पढ़ते हैं,
कानों में लगे दर्द-को-पहुँचने-से-रोकने-वाले फिल्टर।
जिंदा करनी पड़ती है रीड़ की वो-नस
जो आँखों का देखा, देख
नहीं मुड़ने देती गर्दन दूसरी तरफ।
रीड़ की नसों को इतना ना मारा जाए
कि प्रकृति उन्हें टेल-बोन बना दे।
#BharatTiwari

18/6/13

सारे रंगों वाली लड़की - 2

2 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
दूरी से उपजती पीड़ा
अहाते में सूखता सा मनीप्लांट
जैसे मर ही जाएगा
फ़िर आयी
बिना-बताये-आने-वाली-दोपहर
उसकी बेल आम के पेड़ पर चिपकी है
पता नहीं क्यों नहीं मरा
नियति
और कैसे पेड़ के तने को छू गया
पत्तों का विस्तार
देखते-देखते हथेलियों से बड़ा हो गया
वेदना – जब लगा कि जायेगी
स्मृतियों को खबोड़
जड़ से लगी यादें बाहर आने लगी
दर्द पुराना साथी
सहारा देता है – फ़िर क्या धूप क्या अमावस
दूर गए प्रेम की खोज
मिल ही जाता है स्मृति का कोई तना
ब्रह्माण्ड की हथेली से बड़ा रुदन तब अनुभूति का
कैसे मरे ये वेदना

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

सारे रंगों वाली लड़की
वृक्षों में भी हो ना


भरत तिवारी १८.६.२०१३, नई दिल्ली 

11/6/13

सारे रंगों वाली लड़की

12 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
कहाँ हो

सूरज इस काली रात को
जिसने सब छिपा लिया
उसे धराशाई कर रहा है

आम के पेड़ में  अभी-अभी जागी कोयल
धानी से रंग का बौर
सब दिख रहे हैं
उन आँखों को
जो तुम्हे देखने के लिए ही बनीं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

तुम्हारी साँसों का चलना
मेरी साँसों का चलना है
और अब मेरी साँसें दूर हो रही हैं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

गए दिनों के प्रेमपत्र पढ़ता हूँ
जो बाद में आया – वो पहले
सूख रही बेल का दीवार से उघड़ना
सिरे से देखते हुए जड़ तक पहुँचा मैं
पहले प्रेमपत्र को थामे देख रहा हूँ – पढ़ रहा हूँ
देख रहा हूँ पहले प्रेमपत्र में दिखते प्यार को
और वहीँ दिख रहा है नीचे से झांकता सबसे बाद वाला पत्र
और दूर होता प्रेम

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

वहाँ हो
यहाँ हो


भरत तिवारी, ११.६.२०१३  नई दिल्ली 


22/4/13

नए साहब सुनो !

2 टिप्‍पणियां:

कैसा नया माहौल 
बना रहा हो ये 

...हाँ सुना है
जब साहब होते थे
तब 
साहब ही साहब होते थे...
देखा है पर्दे पर 
बेंत चटकाते
धप धप करते ऊँचे भारी जूतों को
किरर्र किरर्र करती मशीन
नोक को फैला 
दिखाती थी साहबों की चालें ...
मगर अब तो 
वो मशीन भी ना रही
तो क्या - 
वो स्वेत श्याम माहौल 
अब आँखों के सामने 
रंग कर दिखाओगे ...

नए साहब लोगों सुनो 
कुछ धहक रहा है
पहले धीमा था
मगर अब
लील खायेगा तुमको  



- भरत 

29/3/13

सब छूट जाता है

4 टिप्‍पणियां:

सब छूट जाता है
जिसका छूटता है उसे क्या पता
एक-एक पल बेच
कल खरीदता
खुशियाँ बेचता
खरीदने के लिए - ख़ुशी
फिर
सब छूट जाता है
बेचे हुए पल और खुशियाँ ही रास्ता देखते हैं
सब छूट जाता है Time Reveals Truth Giovanni Domenico Cerrini
ख़रीदी खुशियों के कितने खरीददार कितने उम्मीदवार
चक्र में पीछे
अनभिज्ञ
हाथ उठा दर्ज करते
अपनी लालसा
भीड़ उठाये हाथ लालसा के  
खरीदने को अनवरत हाथापाई करती
खरीदती ! घातु कागज़ पत्थर के सपने
बेचती आँचल महक मुस्कान,
दुलार बचपन जवानी,
गाँव गली प्यार
अपने सपने
तभी
सब छूट जाता है

कुछ ना बना सकने वाला
बनाने वाले की कृति पर अपना नाम लिख
अपनी मान लेता ,
खुश होता
अपनी बता
अपनी समझ
चक्र का हिस्सा है
चक्र घुमा
और
सब छूट जाता है

17/3/13

भूख खबर मवाद

2 टिप्‍पणियां:

हिंदी कविता समाज की गंदगी खबर
         खबर
         भूख की
         भूखों की
         भूख बेचने वालों की
         नंगों की
         नंगे होतों की
         नंगे करे जातों की
         जंगल की
         जंगलियों की
         जंगलराज की
         जंगल बचाने की
         ... डिमांड में है
         जंगलियों की भूख बढ़ रही है
         डिमांड की नियति – बदलते रहना


         खबर
         बेचने की
         बिकने की
         बिक गए की
         देश की
         विदेश की
         देशप्रेम की
         विदेश प्रेम की
         ... डिमांड में है
         प्रेम बिक रहा है
         प्रेम की नियति – बदल रही है

         अन्दर झाँकना बंद कर दिया
         बाहर देखना मना है
         मैल –
         चमड़ी का पोर पार कर गयी
         रंग खून का और रंगत मवाद की
         मवाद से चले खबरी-मसाला-मशीन
         खबरों के प्रेमी -
              सब ...

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