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13/1/11

राकेश श्रीमाल ~ जब होंठ ही बन जाते हैं कान तुम्हारे

1 टिप्पणी:
“इन्सिदेन्ट्स ऑफ कलर्स एंड प्लेन्स “ 
रोमोलो रोमानी की चित्रकला हस्तनिर्मित तेल चित्रकलाप्रजन


राकेश श्रीमाल की हमेशा की तरह खूबसूरत कविता 
पराकाष्ठा के आसपास का रोमान्स 
कुछ पल लगते हैं .... अलसाई दोपहर में .... होंठों के कानों को / सही है शब्दकोश में कहाँ ये शब्द मिलते है .... 
कुछ लोग तो इसे केमेस्ट्री भी कहते हैं ...... रस पान करें ... सादर भरत तिवारी  




व्यर्थ लगते हैं
दुनिया के सारे शब्दकोष

हँसी आती है
समस्त महान रचनाओं
और उसके रचयिताओं पर

अलबत्ता खुशबु बिखेरते फूल
अपनी ईमानदार चुप्पी मैं
भले लगते हैं हवा की तरह

किसी मौसम की
अलसाई दोपहर मैं
कुछ पल लगते हैं मुझे
वह सब बताने
जिसके लिए नहीं बने अभी शब्द

मेरे होंठ
बहुत सलीके से कहते हैं
तुम्हारे होंठो के कानो को
वह सब कुछ
जो कहना चाहता हूँ तुम्हे..

राकेश श्रीमाल

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